नई दिल्ली: दुनिया की फार्मा इंडस्ट्री में इस समय एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। वैश्विक कंपनियां अपनी सप्लाई चेन को चीन से बाहर फैलाने की रणनीति पर काम कर रही हैं। इसी बदलाव को China+1 रणनीति कहा जा रहा है, जिसमें कंपनियां चीन पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय दूसरे देशों में भी उत्पादन और सप्लाई नेटवर्क तैयार करना चाहती हैं। इस बदलाव का सबसे बड़ा फायदा भारत को मिल सकता है।
भारत पहले से ही दुनिया के सबसे बड़े जेनेरिक दवा निर्माताओं में शामिल है और 200 से ज्यादा देशों में दवाओं का निर्यात करता है। लेकिन दूसरी तरफ भारतीय फार्मा सेक्टर की एक बड़ी कमजोरी यह है कि दवाओं के लिए जरूरी कच्चे माल यानी API (Active Pharmaceutical Ingredients) और इंटरमीडिएट्स के लिए काफी हद तक चीन पर निर्भरता बनी हुई है।
अब सवाल यह है कि क्या भारत इस मौके का फायदा उठाकर वैश्विक फार्मा सप्लाई चेन में चीन का विकल्प बन सकता है?
भारत की फार्मा ताकत: दुनिया का बड़ा दवा सप्लायर
भारत को लंबे समय से दुनिया की “फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड” कहा जाता है। देश की दवा कंपनियां सस्ती और गुणवत्तापूर्ण जेनेरिक दवाओं के लिए दुनियाभर में जानी जाती हैं। भारतीय फार्मा कंपनियां अमेरिका, यूरोप और कई विकासशील देशों में बड़ी मात्रा में दवाओं की आपूर्ति करती हैं। रिपोर्ट के अनुसार, भारत का फार्मास्युटिकल निर्यात लगातार बढ़ा है और यह सेक्टर देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
इसके अलावा भारत के पास बड़ी संख्या में अनुभवी वैज्ञानिक, इंजीनियर और दवा निर्माण से जुड़ा मजबूत इकोसिस्टम मौजूद है।
सबसे बड़ी चुनौती: चीन पर कच्चे माल की निर्भरता
भारत की फार्मा इंडस्ट्री भले ही तैयार दवाओं के मामले में मजबूत है, लेकिन दवा बनाने के लिए जरूरी शुरुआती सामग्री के मामले में अभी भी चीन पर निर्भर है। कई रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत में इस्तेमाल होने वाले APIs और अन्य महत्वपूर्ण कच्चे माल का बड़ा हिस्सा चीन से आता है। कुछ महत्वपूर्ण दवाओं के लिए यह निर्भरता और ज्यादा है। यही कारण है कि कोरोना महामारी के दौरान सप्लाई चेन में बाधा आने पर भारत सहित कई देशों को दवाओं के कच्चे माल को लेकर चिंता हुई थी।
China+1 रणनीति भारत के लिए क्यों बड़ा मौका है?
कोरोना महामारी, भू-राजनीतिक तनाव और सप्लाई चेन जोखिमों के बाद कई बड़ी कंपनियां अब एक ही देश पर निर्भर नहीं रहना चाहतीं। अमेरिका और यूरोप जैसी बड़ी मार्केट्स अपनी दवा सप्लाई को ज्यादा सुरक्षित बनाने की कोशिश कर रही हैं। ऐसे में भारत के पास मौका है कि वह सिर्फ दवा बनाने वाला देश नहीं बल्कि पूरी सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण हिस्सा बने। अगर भारत API, इंटरमीडिएट्स और विशेष रसायनों का घरेलू उत्पादन बढ़ाता है तो वह वैश्विक बाजार में और मजबूत स्थिति बना सकता है।
भारत के पक्ष में कौन-कौन सी बातें हैं?
1. मजबूत मैन्युफैक्चरिंग क्षमता
भारत के पास पहले से ही बड़ी संख्या में फार्मा कंपनियां और उत्पादन इकाइयां मौजूद हैं। कई भारतीय कंपनियां अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार दवाएं बनाती हैं।
2. बड़ी वैज्ञानिक प्रतिभा
देश में बड़ी संख्या में फार्मा विशेषज्ञ, रिसर्चर और तकनीकी कर्मचारी मौजूद हैं।
3. वैश्विक भरोसा
भारतीय कंपनियों ने कई देशों में अपनी मजबूत पहचान बनाई है। खासकर जेनेरिक दवाओं के क्षेत्र में भारत की पकड़ काफी मजबूत है।
लेकिन चीन को पीछे छोड़ना आसान नहीं
चीन ने पिछले कई दशकों में फार्मा और केमिकल इंडस्ट्री में बहुत बड़ा इकोसिस्टम तैयार किया है। वहां बड़े स्तर पर उत्पादन, सस्ती लागत, मजबूत सप्लाई नेटवर्क और केमिकल मैन्युफैक्चरिंग की पूरी चेन मौजूद है। इसी वजह से चीन से मुकाबला करना भारत के लिए आसान नहीं होगा। भारत को इसके लिए सिर्फ दवा निर्माण नहीं बल्कि शुरुआती कच्चे माल से लेकर अंतिम उत्पाद तक पूरी वैल्यू चेन तैयार करनी होगी।
सरकार की भूमिका भी अहम
भारत सरकार ने घरेलू फार्मा उत्पादन बढ़ाने और आयात निर्भरता कम करने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। फोकस सिर्फ दवाएं बनाने पर नहीं बल्कि API और अन्य जरूरी सामग्री के उत्पादन को बढ़ावा देने पर भी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर नीतिगत समर्थन, निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर बेहतर होता है तो भारत इस अवसर का बड़ा फायदा उठा सकता है।
CDMO सेक्टर में भी बढ़ रहा मौका
वैश्विक दवा कंपनियां अब सिर्फ उत्पादन ही नहीं बल्कि रिसर्च और कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग के लिए भी नए विकल्प तलाश रही हैं।
भारत का CDMO (Contract Development and Manufacturing Organisation) सेक्टर इस बदलाव से फायदा उठा सकता है। कई वैश्विक कंपनियां चीन के अलावा दूसरे देशों में अपनी साझेदारी बढ़ाने पर विचार कर रही हैं।
भारत के सामने क्या हैं बड़ी चुनौतियां?
भारत को इस मौके का फायदा उठाने के लिए कुछ चुनौतियों पर काम करना होगा—
- API उत्पादन की लागत कम करना
- रिसर्च और इनोवेशन बढ़ाना
- पर्यावरण नियमों के साथ संतुलन बनाना
- तेज मंजूरी प्रक्रिया तैयार करना
- वैश्विक गुणवत्ता मानकों को बनाए रखना
क्या भारत बन सकता है अगला ग्लोबल फार्मा हब?
भारत के पास क्षमता जरूर है, लेकिन इसके लिए लंबी रणनीति और बड़े निवेश की जरूरत होगी। सिर्फ चीन से कंपनियां हट रही हैं, इसलिए भारत को फायदा नहीं मिलेगा। भारत को यह साबित करना होगा कि वह भरोसेमंद, किफायती और लंबे समय तक टिकाऊ सप्लाई पार्टनर बन सकता है।
China+1 रणनीति भारतीय फार्मा उद्योग के लिए एक बड़ा अवसर लेकर आई है। भारत के पास मजबूत दवा निर्माण क्षमता, वैज्ञानिक प्रतिभा और वैश्विक बाजार में पहचान मौजूद है।
लेकिन चीन पर कच्चे माल की निर्भरता कम करना सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। अगर भारत API उत्पादन और पूरी सप्लाई चेन को मजबूत कर लेता है, तो आने वाले वर्षों में वह वैश्विक फार्मा सेक्टर में और बड़ी भूमिका निभा सकता है।